अंतिम दिनों के मसीह के कथन "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" (भाग एक)
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर मानव जाति के प्रबन्धन, और मनुष्यों के उद्धार की इस घटना को देखता है, जैसे कि यह किसी भी दूसरी चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और ना ही उसे अपने शब्दों से करता है, और विशेष रूप से इन चीज़ों को अकस्मात् ही नहीं करता है—वह यह सब कुछ एक योजना के साथ, एक उद्देश्य के साथ, एक ऊँचे स्तर के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह साफ है कि मानव जाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कार्य कितना ही कठिन है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाधाएँ कितनी ही बड़ी हैं, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मनुष्य कितने ही कमज़ोर हैं, या मानव जाति का विद्रोही स्वभाव कितना ही गहरा है, इसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। जिस कार्य को वह स्वयं करना चाहता है उसके लिए परीश्रमी प्रयास और प्रबन्ध करते हुए परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों को व्यवस्थित भी कर रहा है, और सभी लोगों और वह कार्य जिसे वह पूर्ण करना चाहता है उस पर अपना नियन्त्रण कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने इन पद्धतियों को प्रयोग किया था और मानव जाति को बचाने और उस का प्रबन्ध करने की मुख्य परियोजना में एक बड़ी कीमत अदा की थी। जब परमेश्वर इन कार्यों को कर रहा था, वह थोड़ा थोड़ा करके बिना रूके मनुष्यों के सामने अपने कठिन कार्य, जो उसके पास है और जो वह है, उसकी बुद्धि और सर्वसामर्थता, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को प्रदर्शित कर रहा था। उसने अंश अंश करके इन सब को मानव जाति के सामने खुलकर प्रकाशित किया, और उसने इन चीज़ों को ऐसा प्रकाशित और प्रकट किया जैसा कि उसने पहले कभी भी नहीं किया था।"
अनुशंसित:अंतिम दिनों के मसीह के कथन "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" (भाग आठ)
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